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शेयर बाजार में डर या अवसर निवेशकों के बदलते मिजाज और ‘कैपिट्यूलेशन’ का खेल

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वैश्विक बाजारों में मची उथल-पुथल ने निवेशकों को पशोपेश में डाल दिया है। जहाँ एक ओर ईरान के साथ बढ़ते तनाव और भू-राजनीतिक अस्थिरता ने बाजार की धड़कनें बढ़ा दी हैं, वहीं दूसरी ओर अनुभवी विश्लेषक इसे एक बड़े बदलाव के रूप में देख रहे हैं। हालिया आंकड़ों और बाजार विशेषज्ञों की मानें तो निवेशक अब ‘वेट एंड वॉच’ की मुद्रा से निकलकर निर्णायक मोड़ की ओर बढ़ रहे हैं।


क्या है ‘कैपिट्यूलेशन’ और इसका महत्व


बाजार की शब्दावली में ‘कैपिट्यूलेशन’ उस स्थिति को कहते हैं जब निवेशक डर के मारे अपनी हिस्सेदारी पूरी तरह सरेंडर कर देते हैं। विश्लेषकों का मानना है कि बाजार में एक बड़ी रिकवरी से पहले ऐसी “सफाई” जरूरी होती है। आंकड़ों के अनुसार, जनवरी में S&P 500 के लगभग 70% शेयर अपने 50-दिवसीय औसत से ऊपर थे, जो अब घटकर मात्र 19% रह गए हैं। यह गिरावट दर्शाती है कि बाजार के भीतर एक गहरी घबराहट पहले ही आ चुकी है, जो अक्सर निचले स्तर पर खरीदारी का संकेत होती है।


दिग्गज फर्मों का भरोसा बरकरार


हैरानी की बात यह है कि जहाँ आम निवेशक सहमे हुए हैं, वहीं गोल्डमैन सैक्स (Goldman Sachs) और UBS जैसे दिग्गज संस्थान अब भी ‘बुलिश’ (तेजी के पक्ष में) हैं। गोल्डमैन सैक्स ने 7,600 का महत्वाकांक्षी लक्ष्य बरकरार रखा है। विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिकी नीतियों और ‘ट्रंप पुट’ (बाजार को सहारा देने वाली नीतियां) की वजह से लंबी अवधि में बाजार में तेजी की पूरी संभावना है।

बाजार के जानकारों का कहना है कि वर्तमान में “डर” का माहौल जरूर है, लेकिन यह अल्पकालिक है। अगर हम पिछले 30 सालों के पैटर्न को देखें, तो मौजूदा गिरावट 1994-2000 के बीच आए उछाल जैसी ही दिखती है। निवेशकों को सलाह है कि वे केवल हेडलाइंस देखकर न घबराएं, बल्कि मजबूत फंडामेंटल वाली कंपनियों में बने रहें।

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